मौनियां पर्व : बुंदेलखंड की पावन ग्वाल परंपरा एवं दीवारी नृत्य का अलौकिक उत्सव
ग्वाल परंपरा की अभिव्यक्ति एकाग्र • आदिवर्त जनजातीय एवं लोककला राज्य संग्रहालय, खजुराहो
बुंदेलखंड की माटी का लोक उत्सव 'मौनियां पर्व' (ग्वाल परंपरा की अभिव्यक्ति एकाग्र) 9 नवंबर 2026 को विश्व धरोहर नगरी खजुराहो स्थित आदिवर्त जनजातीय एवं लोककला राज्य संग्रहालय परिसर में भव्यता के साथ आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन जनसामान्य के लिए पूर्णतः निःशुल्क है (कोई टिकट नहीं)। भगवान श्रीकृष्ण की ग्वाल बाल परंपरा, गौ-सेवा, मौन साधना और दीवारी/बरेदी नृत्य के रंगों में रंगे इस पावन उत्सव में प्रदेशभर के लोक कलाकार एवं श्रद्धालु सहभागिता करेंगे।
१ मौनियां पर्व क्या है? ग्वाल परंपरा का रहस्य और महत्व
बुंदेलखंड में दीपावली की पड़वा (गोवर्धन पूजा) से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाली ग्वाल परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इस दौरान अहीर और यादव समाज के साथ समस्त कृषक समुदाय के लोग विशेष व्रत का संकल्प लेते हैं, जिसे 'मौनियां व्रत' कहा जाता है।
मान्यता है कि द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्र के कोप से गोकुलवासियों और गोवंश की रक्षा की थी, तब ग्वालों ने ईश्वर की स्तुति में मौन धारण कर शक्ति और एकाग्रता का संकल्प लिया था। मौनियां बनने वाले भक्त अपने मुंह से एक भी शब्द नहीं निकालते। वे हाथों में मोर पंखों का भारी गुच्छा (मोर-छल) और लाठियां लेकर 12 गांवों की पैदल परिक्रमा कर प्रमुख देव स्थानों पर मत्था टेकते हैं।
२ सजीव वीडियो झलक : दीवारी नृत्य व मौनियां उत्साह
Live Footage३ मौनियां पर्व के तीन दिव्य स्तंभ
मोर-छल एवं लाठी संचालन
प्रत्येक मौनियां सैकड़ों मोर पंखों से बने भारी मोर-छल को हाथों में उठाकर तेजी से घूमता है। लाठियों की खनक शौर्य और आत्मरक्षा के पारंपरिक अभ्यास का प्रतीक है।
कठिन मौन व्रत (Silent Vow)
नृत्य और यात्रा के दौरान साधक पूर्ण मौन रहते हैं। वे केवल घुंघरुओं, ढोलक और साथी ग्वालों की हुंकार के तालमेल से अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं।
गो-पूजन व बरेदी नृत्य
गाय-बैलों को हल्दी-गेरू से सजाया जाता है। बरेदी व दीवारी के दोहे गाकर लोक कल्याण, संपन्नता और अच्छी फसल की कामना की जाती है।
४ आधिकारिक उत्सव आमंत्रण एवं छायाचित्र
श्रद्धालु आगंतुकों का स्वागत अभिनंदन - आदिवर्त परिसर
ग्वाल परंपरा की अभिव्यक्ति एकाग्र - ९ नवंबर २०२६
आदिवर्त खजुराहो का ध्येय : लोक परंपराओं का संरक्षण
मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा स्थापित आदिवर्त संग्रहालय मात्र प्राचीन पुरावशेषों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह सात प्रमुख जनजातियों (गोंड, भील, बैगा, कोरकू, भारिया, सहरिया, कोल) एवं पांचों लोक अंचलों (बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, निमाड़, चंबल) की जीवंत परंपराओं का तीर्थ है। मौनियां पर्व जैसे आयोजनों से गांव-चौपाल के पारंपरिक कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय पहचान और सम्मान मिलता है।
आदिवर्त संग्रहालय परिसर कैसे पहुंचे?
खजुराहो एयरपोर्ट (HJR) मुख्य मंदिर समूह और आदिवर्त संग्रहालय से मात्र 5-6 किमी दूर है। एयरपोर्ट से टैक्सी व ऑटो उपलब्ध हैं।
खजुराहो रेलवे स्टेशन (KURJ) सीधे दिल्ली, वाराणसी, भोपाल और ग्वालियर से जुड़ा है। महोबा व छतरपुर जंक्शन भी निकटवर्ती स्टेशन हैं।
संग्रहालय खजुराहो बायपास रोड पर स्थित है। झांसी, सतना, छतरपुर और पन्ना से नियमित बस एवं निजी वाहन सुगम हैं।
आगंतुक नियम व सुझाव (Visitor Guidelines)
- कार्यक्रम स्थल पर बैठने की व्यवस्था प्रथम आगमन आधार पर है। प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क है (कोई टिकट नहीं)।
- लोक कलाकारों के मोर-पंख एवं पारंपरिक वाद्ययंत्रों का सम्मान करें।
- परिसर को स्वच्छ रखें, प्लास्टिक का प्रयोग निषिद्ध है।
- फोटोग्राफी एवं वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुमति है।